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Friday, May 20, 2011

ए धरा क्यों ?

सिद्दत से करेंगे उस लम्हे का इंतजार
जब भरी आँखों से पढ़ी जाएगी
नब्जों की हर तस्वीर
पहली नजर जब
भरे बादलों की चुभन पहचानेगी
उस तड़प का एहसास की क्या होता है इंतजार
जब वो .........
मेह बन घुटा है
क्यों कड़कता .....
क्यों चमकती है बिजली ........
ठिठुरते हैं लोग
डरती हैं कलियाँ
पर वो आज खुश है कि
अब वो मिलेगा अपनी सांसो से
जिसके लिए वो इतने दिन
निस्तब्ध रहता है
अपलक निहारता है
उसे निर्निमेष नेत्रों से
सिर्फ एक रंगे भाव से
उसके हर उतर -चढाव को देखता है
ऋतुओं कि रौनक देखता है
बस राह में
कि अबकी बारिश में
मिलूँगा तुझसे - बुँदे बन कर
ए धरा क्यों ? तू इतनी दूर है
हम क्षितिज के किनारों पे मिलने का भरम
लोगों को देते हैं क्यों ??????????

तुम ही तुम

देखता हूँ जहाँ तुम ही तुम हो
खुशबू में फूलों के बसे तुम हो
हर राह मेरी मुझे लगती अनजानी सी है
पर जो गुज़रता गलियों से तेरे कभी मैं
तो
निशानी तेरी ही नज़र आती है
जब कभी हँसता हूँ मैं अकेले में
सोच कर तुम्हे
तो हँसी मेरी , हँसी तेरी नज़र आती है
बातें कभी करता था जिन से मैं तुम्हारी
उन में ही मुझे तड़प मेरी नज़र आती है
कागज़ पर जब बनाता हूँ चेहरा कोई भी
पर तस्वीर वो तुम्हारी नज़र आती है


मैं जिंदा हूँ

जाने  क्युं वो साँसों की डोर टूटने नहीं देता ,
बस दो कदम और चलने का वास्ता देकर मुझे रुकने नहीं देता ,

बात कहता है वो मुझसे हँस हँस कर जी लेने की ,
अजीब शख्स है मुझे चैन से रोने नहीं देता ,

आज हौसला देता है मुझे चाँद सितारों को छू लेने का ,
वो प्यारा सा चेहरा मुझे टूटकर बिखरने नहीं देता ,

शायद जानता है वो भी इन आँखों में आंसुओं  का सैलाब है
जाने क्युं फिर भी वो इन आंसुओं को गिरने नहीं देता ,

मुझसे  कहता है "मैं तो मर जाऊंगा तुम्हारे बिना "
मैं जिंदा हूँ अब तक की वो मुझे मरने नहीं देता .

Thursday, May 19, 2011

नज़्म

पत्थर की है ये  दुनिया , जज़्बात नहीं समझती ,
dil   में जो है वो बात नहीं  समझती ,
तनहा तो चाँद भी  है सितारों के बीच मगर  ,
चाँद का दर्द ये बेवफा रात नहीं समझती 


Sunday, May 1, 2011

नज्म


जलते हैं क्यों हम शमा की तरह ,
तुम आओ न बहती हवा की तरह !


आँखें न हुईं मानो हुईं मैखाना ,
पीनी और पिलाने की बस इक शाम चाहिए 




ख़ामोशी..........

लड़की जीती है एक खामोश जिंदगी ,
पैरों टेल रौंदती है सपनों को ,
सोचती है , बुनती है
पर ,
खामोश रहती है...........

क्यों रौंदा सपनों को,
किसी ने कहा,
कांच सरीखा नाजुक जीवन ,
दरक जाएगा ,
किसी ने कहा ,
पढेगी तो
पंख लगा उड़ जायेगी ,
कहते....... चूल्हा  चौका माँ बहन बेटी और न जाने कितनी उपमाएं ,
सुनती है
और उलझती ही जाती है
कहाँ हूँ मैं
क्या मैं " Save Girl Child" हूँ
सच है कि
लड़की सिर्फ संजोई ही जाती है
शीर्ष पे कहीं भी जाए
पर ये ख़ामोशी भरी उलझन
नाम आँखें और मुस्कुराता चेहरा
उसका दामन नहीं छोडती
कुछ भी कर ले
फिर भी कहीं न कहीं
किसी न किसी
तराजू में  उसे अधूरा ही कहते हैं
कब तक जीएगी
आखिर कब तक
ख़ामोशी..........