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Friday, May 20, 2011

तुम ही तुम

देखता हूँ जहाँ तुम ही तुम हो
खुशबू में फूलों के बसे तुम हो
हर राह मेरी मुझे लगती अनजानी सी है
पर जो गुज़रता गलियों से तेरे कभी मैं
तो
निशानी तेरी ही नज़र आती है
जब कभी हँसता हूँ मैं अकेले में
सोच कर तुम्हे
तो हँसी मेरी , हँसी तेरी नज़र आती है
बातें कभी करता था जिन से मैं तुम्हारी
उन में ही मुझे तड़प मेरी नज़र आती है
कागज़ पर जब बनाता हूँ चेहरा कोई भी
पर तस्वीर वो तुम्हारी नज़र आती है


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