अरसों गढ़ा था जिसे ख्वाबों में
आज तड़के पलक खुली तो
सपने रूप गढ़ खड़े थे
तभी इक हवा के झोंके ने नींद की वो तसबी तोड़ी
दरवाजे पे आज वैसे किसी ख़ुशी ने
मानो दस्तक दी थी
इक ख़ामोशी , इक चुप्पी , इक सन्नाटा था
पता नहीं क्या था
कि अब बस खुद में ही लिपटे रहने को जी चाहता है
मंजर खो गया था
पर तलाश अब भी जारी थी
शायद ,
खुद को भी अब दिन में सपने देखने की आदत सी लग गयी है
कोरे कागज़ भी जज्बातों के बवंडर से भरे दिखते हैं
कभी न हो इतनी मोहब्बत कि तू खुद को खो दे
जब नशा इसके जाम का उतरेगा
तो ,न
वक़्त ही तेरा होगा , न तू खुद ही अपना होगा
ये नशा है जो कुछ भुलाता नहीं ,सब कुछ भुला देता है
जो उतरता है तो नमी भरी जिंदगी बेख़ौफ़ दे जाता है
पर दिल की हर कड़ी ने हर मोड़ पे अपनी दस्तक दी थी
एक दस्तक
जो कारवां बदल सकता था वो आशियाँ बदल सकता था
पर दिल की दस्तक के हाथों मजबूर थी मैं ..
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