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Tuesday, March 4, 2014

सिसकती आहें

कहते हैं वक़्त हर दर्द का मरहम है !
आज सत्यमेव जयते के क्रंदन ने ,
आर्त पुकार ने,
हर मानुष को एक बार पुनः सोचने के लिए मजबूर कर दिया होगा...............


दर्द घटता ही नहीं, बढ़ता जा रहा है,
सलवटें मिटती नहीं, बढ़ती जा रही हैं,
लोगों की नजरों में प्यार की थपकी नहीं,
घृणा व जिल्लत की दुत्कार है
क्यों ?
शरीर विदीर्ण कर डाला इसलिए ,
निचला हिस्सा फट गया इसलिए,
बदहाल हालत थी इसलिए,
जिंदा जला डाला इसलिए,
रेल की पटरी पर फेंका इसलिए,
तेजाब फेंका इसलिए............

बड़ी ही अच्छी बात कही ,
सड़क पे चलते कुत्ते ने काटा तो ,
सहानुभूति व दया की सौगात.........
इस बर्बरता......... व क्रूरता के बदले क्या ?
प्रश्नों की बौछार
अश्लीलता की हदें पार,
व्यक्ति परिवार समाज अदालत  हर कटघरे में,
क्यों ?

उस नन्ही मासूम बच्ची ,
जिसने सीखा भी न था बोलना,
घर से बेघर हुई,
समाज की हिकारत सही,
न जाने कितने दिनों तक चूल्हा न जला,
क्यों ?

बेबसी का आलम इतना दर्दनाक,
बालिका, युवती , प्रौढ़ा, वृद्धा,
स्त्री का हर रूप इस बर्बरता का शिकार,
मासूमियत की सजा है ये ?
क्या है?
हर रूप में दोषी नजरों से बिंधती स्त्री ही क्यों ?
चाक के हर पाट में पिसती क्यों?
सवालों के कटघरों से जूझती क्यों?
क्रूरता की हदें पार करता, दानवीयता का,
हर शिकार,
स्त्री ही क्यों?
सामूहिक हो या एकल हो !
नृशंस समाज की नग्नता का चिग्घाड़ करती है ये  हैवानियत......

मेरे शब्दों की औकात नहीं कि,
उस टभकते, चुभते , मसोसते, सुलगते दर्द को,
उकेर सके......................

सिर्फ नम आँखें कब तक ?
एक बिगुल है , उद्घोष है,
उस खौलते,उबलते उफान की सच्ची तस्वीर है " सत्यमेव जयते" की पहल,
हर स्त्री की पीड़ा का, कराह का मंच है,
जहां अस्पतालों और पुलिस का कच्चा चिट्ठा है खुला,
वहीं एक रोशनी की किरण है,
अब हर नज़र में थोड़ी तो हया होगी,
अब दर्द शायद महीनों, सालों, अरसों सजोना न होगा,
अगली पेशी के लिए उमड़ते सैलाब से,
हर चुभन बह जाने को तैयार होगी,
जगमगाहट में आँखें चौंधियाँ के  झुकेंगी नहीं,
सृष्टि के हर जर्रे में मधुमास होगा,
दर्द को कुरेदते काँटों से, सवाल न होंगे,
बह जाएगा दर्द,
दर्द मुझे देकर जो चैन से जी रहा था,
जिसे लोगों ने मुझे चाह कर भी भूलने न दिया,
जब तक पूरता तब तक फिर कुरेद देते,
इस खूफ़्र से बाहर आकर,
जीउंगी मैं , गढ़ूँगी मैं नए सपने,
कुचल के रख दूँगी दरिंदों को,
इस उम्मीद का दामन थामे रखूंगी हर कदम,
क्योंकि पूरा भारत शायद उनींदी से जाग रहा है............
जय हो भारत...  सत्यमेव जयते ।

 (  हम सबको अपनी पहल करनी होगी ,
क्योंकि हर बूंद का अपना अस्तित्व है )



Friday, May 20, 2011

ए धरा क्यों ?

सिद्दत से करेंगे उस लम्हे का इंतजार
जब भरी आँखों से पढ़ी जाएगी
नब्जों की हर तस्वीर
पहली नजर जब
भरे बादलों की चुभन पहचानेगी
उस तड़प का एहसास की क्या होता है इंतजार
जब वो .........
मेह बन घुटा है
क्यों कड़कता .....
क्यों चमकती है बिजली ........
ठिठुरते हैं लोग
डरती हैं कलियाँ
पर वो आज खुश है कि
अब वो मिलेगा अपनी सांसो से
जिसके लिए वो इतने दिन
निस्तब्ध रहता है
अपलक निहारता है
उसे निर्निमेष नेत्रों से
सिर्फ एक रंगे भाव से
उसके हर उतर -चढाव को देखता है
ऋतुओं कि रौनक देखता है
बस राह में
कि अबकी बारिश में
मिलूँगा तुझसे - बुँदे बन कर
ए धरा क्यों ? तू इतनी दूर है
हम क्षितिज के किनारों पे मिलने का भरम
लोगों को देते हैं क्यों ??????????

तुम ही तुम

देखता हूँ जहाँ तुम ही तुम हो
खुशबू में फूलों के बसे तुम हो
हर राह मेरी मुझे लगती अनजानी सी है
पर जो गुज़रता गलियों से तेरे कभी मैं
तो
निशानी तेरी ही नज़र आती है
जब कभी हँसता हूँ मैं अकेले में
सोच कर तुम्हे
तो हँसी मेरी , हँसी तेरी नज़र आती है
बातें कभी करता था जिन से मैं तुम्हारी
उन में ही मुझे तड़प मेरी नज़र आती है
कागज़ पर जब बनाता हूँ चेहरा कोई भी
पर तस्वीर वो तुम्हारी नज़र आती है


मैं जिंदा हूँ

जाने  क्युं वो साँसों की डोर टूटने नहीं देता ,
बस दो कदम और चलने का वास्ता देकर मुझे रुकने नहीं देता ,

बात कहता है वो मुझसे हँस हँस कर जी लेने की ,
अजीब शख्स है मुझे चैन से रोने नहीं देता ,

आज हौसला देता है मुझे चाँद सितारों को छू लेने का ,
वो प्यारा सा चेहरा मुझे टूटकर बिखरने नहीं देता ,

शायद जानता है वो भी इन आँखों में आंसुओं  का सैलाब है
जाने क्युं फिर भी वो इन आंसुओं को गिरने नहीं देता ,

मुझसे  कहता है "मैं तो मर जाऊंगा तुम्हारे बिना "
मैं जिंदा हूँ अब तक की वो मुझे मरने नहीं देता .

Thursday, May 19, 2011

नज़्म

पत्थर की है ये  दुनिया , जज़्बात नहीं समझती ,
dil   में जो है वो बात नहीं  समझती ,
तनहा तो चाँद भी  है सितारों के बीच मगर  ,
चाँद का दर्द ये बेवफा रात नहीं समझती 


Sunday, May 1, 2011

नज्म


जलते हैं क्यों हम शमा की तरह ,
तुम आओ न बहती हवा की तरह !


आँखें न हुईं मानो हुईं मैखाना ,
पीनी और पिलाने की बस इक शाम चाहिए 




ख़ामोशी..........

लड़की जीती है एक खामोश जिंदगी ,
पैरों टेल रौंदती है सपनों को ,
सोचती है , बुनती है
पर ,
खामोश रहती है...........

क्यों रौंदा सपनों को,
किसी ने कहा,
कांच सरीखा नाजुक जीवन ,
दरक जाएगा ,
किसी ने कहा ,
पढेगी तो
पंख लगा उड़ जायेगी ,
कहते....... चूल्हा  चौका माँ बहन बेटी और न जाने कितनी उपमाएं ,
सुनती है
और उलझती ही जाती है
कहाँ हूँ मैं
क्या मैं " Save Girl Child" हूँ
सच है कि
लड़की सिर्फ संजोई ही जाती है
शीर्ष पे कहीं भी जाए
पर ये ख़ामोशी भरी उलझन
नाम आँखें और मुस्कुराता चेहरा
उसका दामन नहीं छोडती
कुछ भी कर ले
फिर भी कहीं न कहीं
किसी न किसी
तराजू में  उसे अधूरा ही कहते हैं
कब तक जीएगी
आखिर कब तक
ख़ामोशी..........


Sunday, January 24, 2010

क्या है ?सुलगती आहें!  एक ऐसी आवाज जिसे न वक़्त मिला कि  अपनी चुभते दर्द ,भरी आँखों के जज्बात को,टीसते, टभकते ,खीजते ,एहसास को बयां  कर सके         

Saturday, January 23, 2010

चिराग



चले  थे  राह  में  तनहा..........
कि कही  कभी  मेरा  आशियाँ मिलेगा ........
पल -पल  बुना  था  सपना  कि , कोई  ,कहीं  , मेरे  इंतजार  में  होगा
राह  चली  उसके  साये  के  साथ ..............
कि  उसे  ये  एहसास  न  हो  कि , वो  एक  क्षण  के  लिए  भी  अकेला  है ...............


न  उसे  ये  महसूस  होता  कि ..............
ये  पलकें  क्यों  नम हैं
ये  आँखें  क्यों  भरी  हैं ..........
ये  आवाज  क्यों  संजीदा  हैं ............


जली  रोटी   का  न  दर्द  जाना  था ??????
अधपके  चावल  का  न  मर्म  जाना  था
रची  हथेली  का  न  ख्वाब  जाना  था  ???????
साजो  -सिंगर  का  न  अरमान  जाना  था ,,,,,
फिर  भी  तकिये  गीले कर  -कर  काटी  है  ,,,,,,,,,,,,,जिन्दगी
उसके  रुख  के  इंतजार  के  लिए ..................

जानते  हैं , ......................................

खुद  जलके  भी  चिराग  रौशनी  ............
क्यों  देता  है ?????????????

क्योंकि  उसे  प्यार  है .................................  
उजाले  से  आई  ,चेहरे  की  हर  खुशी  से .............................
 क्योकि  जब  मन  जुड़  जाता  है  तो  बस  इंतजार  ही  एक  आस  राह  जाती  है ...........................
  



Friday, January 22, 2010

ख़ामोशी

ख़ामोशी  वो  है   जो न  शब्दों  में  बयां  हो ...................
वो  नजर  की  हया  है  ............
दिल  में  छुपा  डर  है ...........
चाह के  भी  न  कहने  की  सजा  है ...................
कहीं  दर्द  है ..............
तो  कहीं  आंसू .............
ये  ख़ामोशी  हमारी  नहीं
वो  जो  हर  रोज  न  चाह  के  भी  ........
मजबूर  है ..............
अपना  सब  कुछ  लुटाने  को
फिर  भी  तनहा  है .................
कि ???????????????
काश  कोई  तो  ,,,,,,,,,
कोई  तो
हो
जो
मुझे  समझे ..............
क्या  मैं  केवल ..............
अंकशायिनी  हूँ ..................
वो  पीड़ा  की  गठरी  बनी .................
राह  तकती  है
मूक  हो  कर ......
निस्तब्ध  नेत्रों  की 
  ये  ख़ामोशी
चित्कारती  है ..........
कभी  तो  समझो  हम  बेजुबानों  का  दर्द
....................

 


ज़िन्दगी



                                               जिन्दगी  ने  एक  रोज  पूछा 
                                            क्या  हूँ  मैं ???????????????
                                 जानते  हो ........
                                 
                                 थोड़ा  -थोड़ा
                                 मैं  बताती  हूँ

                                हंसी ,खुशी ,गम ,
                                  बादल ,बिजली ,पानी
                                  सृजन ,विकास ,संहार
                                   अमराई  की  गूंज ....
                                   कोयल  की  कूक ..........
                                   भोर  का  खट्टापन .......
                                   सावन  की  बारिश
                                   मेहँदी  की  लाली ..........
                                   चूड़ी  की  खनक 
                                   पायल  की  झनक ........
                                   आँखों  का  इंतजार ................
                                 गम  में  भी  मुस्कुराने   का  नाम  जिन्दगी
                                   सच  कहूँ  तो  .................    
                                   अपने  मंजर  की  हकीकत
                                    चाँद  की  चांदनी ..........
                                    रिश्तों का  एहसास .......
                                    किसी का  बनने की  चाहत
                                    किसीका  ख्वाब 
                                    पल -पल  जीने  का  नाम 
                                    
                                     जिन्दगी 
                                     उदास  चेहरे  में  रंगत  लाने  का   नाम
                                      जिन्दगी
                                     बिछड़  के  भी  पाने  का  नाम
                                     जिन्दगी
                                    अनमोल  तोहफा  प्रेम 
                                    को  जीने  का  नाम
                                      -रचने  -बसने  पगने  का  नाम  जिन्दगी
                                    मेरी नजर में ये है ज़िन्दगी

रिश्ते



रिश्ते  नब्ज  हैं  !!!!!!!!!!
उठते  एहसास  के
चलते  नज्म  के
पल -पल  जीते  जज्बात  के
आँखों  के  दर्द  के
खुशी  के  एहसास   के
पलकों  के  साये   हों   या ----
पनपते  अरमान  की
हर  चाहत  ........

उनसे  अरमान  जुड़े  हैं .......
संबंधों  की  कड़ी
बनाने  का  मीठा  -
जज्बा   है
जिन्दगी  को  नायाब  बनाने  और
सबको  पिरोने  का  सूत्र  है
माँ  का  सदियों  से  सजोया  घरोंदा है
तो  पिता   की  अनकही  ख्वाहिश
लम्हें  -लम्हें  की
बुनी  चादर  है

वो  साथ  है  तो
राह  बन  जाती
मंजिल  पास  होती  है  

इस  भरी  भीड़  में
साया  हैं  रिश्ते
बिना  बोले
पहचानने  की  कवायद  है
रिश्ते
रब   का  बनाया  अनमोल  तोहफा  है
रिश्ते
भावना  की  लड़ी
संबंधो  की  पूजा  है
रिश्ते
 गढ़ता  है
सोचता  है  इन्सान
 रिश्ते
पर बनाता  है
ऊपर  वाला
चलते  है  हम -सब
संजोते  हैं  सिद्दत से

बढती दूरियां
आज  जो  है (समाज   में  बढती  हननता)
वो  क्यों ???????????
कि........
हम  भूल  जाते  हैं .......
रिश्ते

इसलिए
जब  तक  है  साँस
जियो  हर  रिश्ते  को ........
तभी  बनती  है ,
 पूरी  होती  है ......
एक  मुकम्मल  आशियां की
सच्ची  तस्वीर 
मेरी  नजर  में
ये  है
रिश्ते !!!!!!!!!!!!!!



सपने



मिलना   और  बिछड़ना  नियति  है
संगे  दिल  का  तड़पना  मज़बूरी  है
बिछड़  के  हर  पल  साथ  रहना  भी
जीने  के  लिए  जरुरी  है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
 
क्योंकि   हर  वक़्त  वो  नजर  में  है
दूर  हो  के  भी  करीब  है
अश्क  के  हर  पैमाने  में  है
रोली ,कुमकुम ,राग  -रंग  ,
सुख  -दुःख  ,दिवस  -रैन ,
अमावस -चांदनी  ,पूनम .
तीज -त्यौहार ,फ़िजा  के  हर  नूर  में
कदम  की  हर  बुनियाद  में
कलम  की  गति  में  !!!!!!!!!
मेरी  छवि  में  !!!!!!!!!!!!!!

 मेरे  सपनो  का  संसार  है ,
मेरी  तमनाओं  का  रूप  है ,
रब  का  भेजा  नायब  तोहफा  है ,
अब  तो  बस  उनका  साया  बनने  की  चाहत  है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!



सच है न ?


 कुछ   रिश्ते  बदलती  हवा  है  तो
कुछ  रिश्ते  रूह  की  नज्म 
कुछ  तो  ऐसा  है  जो  संग  चलता  है 
आज  भी  कल  भी  -यूँ  कहें  तो !
बदलती  फिजा  के  हर  रुख  के  साथ ...................
चलता  है  संग -संग 
जाने  क्यूँ??????????
क्यों  ?कुछ  तो  है 
जुड़ते   है  कदम  कुछ  ..............
नया  रचने  के  लिए 
मिलती  है  नजरें ..............
साथ  जीने  के  लिए 
जुड़ते  है  बंधन  ...
किसी को   अपना  कहने  के  लिए .........
अपना  जिसे  कुछ  बताने  में ..........
आँखे भर  आईं
मन  तलाशे उसे .............
जैसे  मीन  और  पानी 
सच  है  न  ?

यादें

कभी चले थे हम साथ-साथ
थामें रहते थे एक-दूसरे का हाथ

एक दूसरे के दिल थे इतने पास
कभी अलग होंगे
यह हमने सोचा ही नहीं था
वक्त गुज़रते-गु्ज़रते दूर होते गए
हम पाले रहे याद उनकी
उनके बिना लम्हें खालीपन के साथ

यूँ ही गुजरते रहे
कभी दिल भी इतनी दूर होंगे
यह हमने सोचा ही नहीं था
उनकी याद में हमें दिल में
चिराग उम्मीद के जगाये रखे
जब भी उनकी याद आयी
अधरों पर मुस्कान उभर आयी
हम अपने अँधेरों में भी
उनसे रोशनी उधार माँगें
यह हमने सोचा ही नहीं था
जो एक बार उनके
घर के बाहर रोशनी देखी
उस दिन कदम खिंच गए
वह अपनी खुशी में
वह हमें भूल जायेंगे
यह हमने कभी सोचा ही नहीं था
हमें देखकर भी उनके चेहरे पर
मुस्कान नहीं आयी
आखें थी उनकी पथराई
हम खड़े थे स्तब्ध
उनके मेहमानों की फेरहिस्त में
हमारा नाम नहीं था
पास थे हम, पर दूर रहा उनका हाथ 

जज्बात


जाने  क्यूँ  वो  साँसों  की  डोर  टूटने  नहीं  देता
बस  दो  कदम  और  चलने  का  वास्ता  देकर  मुझे  रुकने  नहीं  देता

बात  कहता  है  वो  मुझसे  हँस  हँस  कर  जी  लेने  की
अजीब  शख्स  है  मुझको  चैन  से  रोने  नहीं  देता

आज  हौसला  देता  है  मुझे  चाँद  सितारों  को  छू  लेने  का
वो  प्यारा  सा  चेहरा  मुझे  टूटकर  बिखरने  नहीं  देता

शायद  जानता  है  वो  भी  इन  आँखों  में  आंसुओ  का  सैलाब  है
जाने  क्यूँ  फिर  भी  वो  इन  आंसुओ  को  गिरने  नहीं  देता

मुझसे  कहता  है , "मैं  तो  मर  जाऊंगा  तुम्हारे  बिना "
मैं  जिंदा  हूँ  अब  तक  के  वो  मुझे  मरने  नहीं  देता 


दस्तक


अरसों गढ़ा था जिसे ख्वाबों में
 आज तड़के पलक खुली तो 
सपने रूप गढ़ खड़े थे 
तभी इक हवा के झोंके ने नींद की वो तसबी तोड़ी 
दरवाजे पे आज  वैसे  किसी ख़ुशी ने 
मानो दस्तक दी थी 

इक ख़ामोशी , इक चुप्पी , इक  सन्नाटा था 
पता नहीं क्या था 
कि अब बस खुद में ही लिपटे रहने को जी चाहता है 
मंजर खो गया था 
पर तलाश अब भी जारी थी

शायद , 
खुद को भी अब दिन में सपने देखने की आदत सी लग गयी है

कोरे कागज़ भी जज्बातों के बवंडर से भरे दिखते हैं 

अब तो नज्म की रुसवाईयों से हर तरन्नुम भी  मेरी रूबरू है 
कभी न हो इतनी मोहब्बत कि तू खुद को खो दे 
जब नशा इसके जाम का उतरेगा 
तो ,न
वक़्त ही तेरा होगा , न तू खुद ही अपना होगा 
ये नशा है जो कुछ भुलाता नहीं ,सब कुछ भुला देता है 
जो उतरता है तो नमी भरी जिंदगी बेख़ौफ़ दे जाता  है
पर दिल की हर कड़ी ने हर मोड़ पे अपनी दस्तक दी थी 

एक दस्तक 
जो कारवां  बदल सकता था  वो आशियाँ बदल सकता था 
पर  दिल की दस्तक के हाथों मजबूर थी मैं  ..

दर्द भरी सीवन

दरख्तें भी पिघल जाती हैं,

मोहब्बत ऐसी खानगी है |
ये कौन सी मिटटी है ,
जो नम भी नहीं होती |


हर जंजीर की कसावट ,
अपनी वफ़ा की गुजर सुनती है |
हम ये सोच के तनहा हैं ,
कि कोई कड़ी तो मेरी भी होगी न |


पैरों के महावर  किस्से कई सुनते हैं ,
 काश कि कोई किस्सा मेरी नज्मों में भी होता |

चुभन भरे अंगों पर ,
मरहम के पैबंद लगाया न करो |
ये वो मवाद है,
जो पैबंद भी जख्म बन जाए |


हर दिन आस में इसी गुजरता है ,
कि कल की किरण मेरी होगी |
पर हर शाम दिन के 
पिघलने की दास्ताँ सुनाती है |


सिवाए दर्द के मैंने उसे कुछ न दिया ,
वो सोचता है ......
पर ऐ  जाने बत्तूर !
मैंने तो जब से जाना तुझे,
हर अक्स और ख्वाब को तुझे में ही समेट दिया | 


वो आये पहलू में कि दामन खिल उठा ,
पर किस्सा वो उठा कि तह्बन भी नम हो उठा |